प्यार
बहुत कुछ सिमटा होता है, इन अधूरे से शब्दों में। ना जाने लोगों ने क्या- क्या परिभाषाएं बना रखी हैं। जिसको जैसा लगता है वह प्यार की अपनी एक अलग परिभाषा बना लेता है। यहां हर किसी को स्वयं से ज्यादा अपने ख्वाबों से प्यार होता है। वो अपने ख्वाबों के पिछे इतना तेजी से दौड़ता है। की स्वयं को बहुत पिछे छोड़ देता है। हम स्वयं को भूल जाते हैं। अरे जब स्वयं से ही प्यार नहीं करोगे तो उसको कैसे संभालोगे जिसको अपने अपना सब कुछ माना है।
प्यार को समझना बहुत ही आसान है। हमें जिस सख्श की अच्छाईयां - बुराईयां दोनों प्यारी लगने लगे । या फिर यूं कहें उसकी मौजूदगी का अहसास भी हमारी रूह को छू ले समझ जाना मामला गंभीर है।
क्या करें ऐसे में-
मैं तो कहती हूं कुछ मत सोचिए जाईए और जाकर सीधा बोल दीजिए। अगर सोचने में समय निकालते रहे तो आपके हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा। सब कुछ समय अपने साथ बहा कर ले जाएगा। इससे अच्छा है समय रहते आप उसको बोल दो की आप नहीं रह सकते उनके बिना। रिजेक्शन का डर तो रहता ही है। लेकिन यह भी तो सोचो कि अब वह क्या आपके पास में है, नहीं ना और सोच कर देखो क्या पता उनको आपके एक बुलावे का ही इंतजार हो। होने को तो कुछ भी हो सकता है ना।
ये सच है एक बार आपने हिम्मत करके अगर उनको अपना हाल सुना दिया ना, तो बहुत सारा बोझ आपके सिर से उतर जाएगा। जवाब में चाहें हां हो या ना हो। खुद को पहले ही दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखना पड़ेगा। जवाब कहीं ना कहीं आपके अंदर ही होता है। बस आपको खुद को बिखरने नहीं देना है। उसके बाद आप बहुत आसानी से अपने जीवन में आगे बढ़ सकतें हैं। अगर वह आपके साथ चलने को तैयार है तो आपके सफर में चलने में आपको आसानी होगी। लेकिन वह आपके साथ चलने को तैयार नहीं है, तो क्या हुआ। हो सकता है आपकी चाहत से ज्यादा आपको किसी ने भगवान से मांग रखा हो।
और यकिन मानना - जब जिससे आप प्यार करते हैं वह आपके साथ है तो आपको उस रास्ते के कांटों को साफ करना होता है। लेकिन आपके सफर में वह है जो आपसे प्यार करता है तो वह स्वयं उस रास्ते में लगे कांटों को साफ करेगा। और यदि आपने ज़रा सा भी उसका साथ दे दिया तो वह शख्स आपको अपना ईश्वर मानेगा।
बहुत फर्क है दोनों बातों में - एक वो जिससे आप प्यार करते है।
एक वो जो आपसे प्यार करता है।

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