F डर - Comrade

डर




अजीब सी बैचेनी सताए जा रही है ।
क्योंकी ? मुझे डर लग रहा है ।।

किसी को यह गन्ने सा मीठा लगे तो किसी को करेले सा कडवा लगे लेकिन मुझे यह लूूँण सा लग रहा है।
किसी को यह पाने की खुशी लागे तो किसी को विरह की वेदना सा लागे लेकिन मुझे राधा का इंन्तजार सा लग रहा है।
किसी को तेैरना सीखा दिया तो किसी को डूबा दिया पर मुझे मझधार में खड़ा कर रहा है।

मोतियों से भरा भंडार बीखर रहा है।
सब कुुछ समेटू कैसे आंँचल छोटा लग रहा है।।

मेरे अतित की खुशिया मेरे मन को लहजा रही है।
मेरा आज मोन रहकर अपने गमो को समेट रहा है।
मेरा भविष्य मन मे आशाएं लिए मेरा पथ निहार रहा है।

कोई मधुर सी ध्वनी सुुुुनाई पड़ रही है।
मेरे डर में मुुुुझे मेरी ताकत नजर आ रही है।।

उम्मीद की ज्योति में डर का तेल डालकर विस्वास की लो जला रही हूँ।
तेजी में विरोद्ध को पाया, धीरे में आलस्य को, मध्यम में संतोस का जन्म हो रहा है।
अतीत को साथ लेेेकर भविष्य की चिन्ता करके आज में डूबी जा रही हूँ।
क्योंकि मै डर रही हूँ ।
अजीब सी बैचेनी सताए जा रही है।।
                         
                                                                   Bharti


CONVERSATION

0 Comments:

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box