कामयाबी
जिंदगी कोल्हू के बैल जैसी बीत रही है।
सफर जहां से शुरू किया वहीं आके खत्म हो रहा है।
बीतता समय कुछ कहना चाहता है।
कद की उंचाई कामयाबी से मापता है
कामयाबी के मायने भी कहां एक जगह टिके हैं।
प्यासे के लिए पानी को पाना कामयाबी है।
भूखे के लिए रोटी को पाना कामयाबी है।
जिनको ये सब मिले वो सीर पर छत चाहता है।
सुबह उठते है तो साथ में उठती है, इच्छाएं।
कुछ अपनी तो कुछ अपनों की।
उन इच्छाओं को पीठ पर लिए ,
बाजार में अपने सपनों का सौदा करते हैं।
और थक-हार कर सो जाते हैं।
अगली सुबह फिर उठते हैं , बेहतर कोशिश करने के लिए।
जिंदगी में कामयाबी के खालीपन को भरने में लगे रहते हैं।
जबकि कामयाबी वो छेद किया हुआ मटका है।
चाहे कितना भी भरो वो खाली ही रहता है।
कामयाबी के सफर का कोई अंत ही नहीं है।
हर पल हर शख्स के लिए यह अलग मायने बनाती है।
हां, इसके पीछे इंसान अपने सांसों की गिनती पूरी करता है।
लेकिन इंसान जिंदगी को जीना भूल जाता है।

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