कितनी अजीब बात है ना..--
इंसान इस दुनिया में अकेला आता है
और जब से वह अपना होश संभालता है
एक ऐसे साथी की तलाश में निकल खड़ा होता है
जो उसको समझे, उसके सुख - दुख में उसका साथ दे, जब सारी दुनिया में उसका साथ देने वाला कोई ना हो तब वह उसके लिए हमेशा खड़ा रहे।
लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि भगवान ने हमें इस दुनिया में भेजने से पहले कुछ तो सोचा होगा।
ईश्वर हर इंसान को संपूर्ण बनाकर ही इस धरती पर भेजता है।
देखा जाए तो हमारा सबसे बड़ा साथी हमारे आंसू होते हैं। यहां मन उदास हुआ कि वह प्रकट हो गए। और वो दुख में ही नहीं बल्कि खुशी में भी अपना साथ नहीं छोड़ते।
यह क्यों सोच कर परेशान हो कि - हमारे लिए कोई हो या हम किसी के लिए हो। इंसान का संपूर्ण शरीर उसके लिए सब कुछ है। जिस प्रकार मां अपने बच्चे को पैदा करने के बाद उसे नहीं भूलती।
तो आपने यह कैसे सोच लिया कि हम अकेले हैं। ईश्वर है ना हमारे साथ, तो बस आप हमेशा खुश रहें और अपना कर्म करते रहें। और चिंता करने का काम उस परमात्मा पर छोड़ दें। अगर ईश्वर है तो हमें कुछ चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है। और जहां ईश्वर नहीं तो चिंता करने से होगा क्या। और जहां आपने चिंता या अविश्वास ही कर लिया तो आपको ना तो ईश्वर पर और ना ही अपने आप पर विश्वास है।
कहते हैं ना " जहां मैं हूं वहां मैं नहीं और जहां मैं नहीं वहां मैं हूं।"


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