तुम्हें शौक है बाजे- गाजे का जरा दबे पाव चले आना
अभी सुलाया है थपथपा के उन अरमानों को ना जगाना
अभी सुलाया है थपथपा के उन अरमानों को ना जगाना
तु परिंदा नज़र आया उस खिलती प्यारी बगिया का
ऊंची उड़ान ना भरना छत गीली है मेरे हुजरे की
पतझड़ रहती है यहाँ पंखों को आहिस्ता खोलना
झड़ जाएगी वो भी जो कोपल फूटी हैं अभी-अभी
कोमल कदम संभाल के सूख के कांटे बिखर गए
समय लगेगा मैं अभी लगी हूँ आंगन मेरा संवारने
सुना है, आता है तुम्हें चेहरा पढ़ना पर्दा ना हटाइये
तुम जैसे हो जो भी हो हम तुम्हें आहट से पहचान गए
ये साजिशों में रचि दौड़ धूप पागल हमें बन देगी
तू आगे-आगे चल मैं तेरे कदमों के निशां पे चल दूंगीं
फिर से महका मेरा आशियां तू इत्र के जैसे बिखरा है
जर्रा-जर्रा खिल गया है तू सावन के जैसे बरसा है
Bharti
झड़ जाएगी वो भी जो कोपल फूटी हैं अभी-अभी
कोमल कदम संभाल के सूख के कांटे बिखर गए
समय लगेगा मैं अभी लगी हूँ आंगन मेरा संवारने
सुना है, आता है तुम्हें चेहरा पढ़ना पर्दा ना हटाइये
तुम जैसे हो जो भी हो हम तुम्हें आहट से पहचान गए
ये साजिशों में रचि दौड़ धूप पागल हमें बन देगी
तू आगे-आगे चल मैं तेरे कदमों के निशां पे चल दूंगीं
फिर से महका मेरा आशियां तू इत्र के जैसे बिखरा है
जर्रा-जर्रा खिल गया है तू सावन के जैसे बरसा है
Bharti


0 Comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box