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Sunday, August 18, 2019

हरियाणवी जोक्स


" जिसकी मस्ती जिन्दा है - उसकी हस्ती जिन्दा है "
जीवन में सब काम जरूरी होते हैं। तो हसना भी तो जरूरी है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिनाई भरी क्यों ना हो अगर अपनो का हो तो हर गम से जीता जा सकता है।        
   

  
एक  दिन हरियाणा का छोरा अपने पडोस मैतैै इस्त्र्री लेन चला गया....
आकै बोलया..
"रै चाचा, इस्त्री देेेदे..."
चाचा नै अपनी जनानी कानि इसारा करया और बोलया-
" ले जा वा बैठी.."
छोरा चुप - चाप देेखन लागया.....
बोलया - " यो नहीं , कपड़े वाली....."
चाचा बोलया - " भले मानस तन्ने , यो बगैर कपड़े दिखै है के ...? "
छोरा गुस्से में चिख्या - " ना चाचा बावला ना बन ,
                          करंट वाली इस्त्री...."
चाचा बोला - " बावले हाथ तै लगाके देख.....जे ना मारे करंट , फेेर कहिए....."   ॥😂😂😂




कई बार मन्ने लागैै है ...।
के भगवान नै ईन लडका गैला नाईनसाफि करी सैै
वो नयू
आप मंदिर मै चले जाओ ....
वहां आपनै....
👩
देवी ,
भक्ति,
माला ,
पूजा ,
अर्चना ,
आराधना ,
ये सब सुनने को मिलेगा
👦लडकों के नाम पेे...
 क्या ..?
घंटा॥😢😉😋😁😁😁



आजकल के बच्चों को सब्जी पसंद ना आने पर माँ कितने    ओप्सन देती है ,
मैगी खा ले ,
पास्ता खा ले,
पिज्जा बना देेेती हूूँ

हमारी माँ के पास 2 ही ऑप्शन होते थे। सबजी खानी  है या चप्पल ।

हम दोनों खा लेते थे। पहले चप्पल फिर सबजी 😯😁😁😁😁

                                       Bharti

Friday, August 16, 2019

क्यों मोल ली मेंने ये लड़ाई

लड़ाई


कर बैठी मैं  ऐसी नादानी 
 क्यों मोल ली मैंने ये लडाई
वो सुबह मैं कभी ना भूल पाई
माँ से वो शिक्षा नये रूप में पाई

मेरी नींद तब टूटी 
जब सूरज की किरण फूूटी
देर रात सोने की डाट मैंने सुबह - सुबह खाई
मेरी हालत देेख चिड़िया भी ईतराई

उन सब के बीच मेरी गाय का रंभाना
और मेरी नींद का उड़ जाना
माँ का चुुुल्हा - चौका लीपना
उस सौंधी खुशबू का कहीं ओर न मिलना

जब मैंने ली अंंगड़ाई 
माँ ने झोली दे बुलाई
गोबर से भरी टोकरी मेरे सिर पर रखवाई
मैं हड़बड़ाई

नाइंसाफ़ी अपनी चरम सीमा तब पार कर पाई
जब सारे काम की लिस्ट मेेरे हाथ में खमाई
मैंने इस अत्याचार के खिलाफ आवाज लगाई
मुझे एक और डयूटी थमाई

दूध-छाछ वालों की कतार देख मैं चकराई
दादी बोली बिटिया रानी अब क्यों घबराई
मैं मन ही मन मुसकुराई
मेरे अपनों ने मिलकर मेरी अच्छी बैंंड बजाई

कुछ भी कहो मजा आ रहा था
झोली भर आशीर्वाद मिल रहा था
समय भी विरोध में था
शरीर दर्द में चूर था

मुझ पर बेेेेहोशी तब झाई
जब मैं जान पाई
माँ के लिए तुच्छ सा है यह काम 
 दस गुणा ताकतवर हैं बाकी काम 

मैं पढ़़ाई की तुलना घर के काम से करती थी
माँ मेरी मन ही मन मुसकुुुराती थी
सबकी अपनी-अपनी महत्ता होती
ये सब कुछ बड़े प्यार से समझाती थी

मैंने अभिमान को तोड़ कसम खाई
मिल बाट कर काम करने की ईच्छा जताई
 क्यों मोल ली मैंने ये लड़ाई
अब मैं सब समझ पाई

               Bharti



Tuesday, August 13, 2019

मेरी आशिकी


मेेरी आशिकी.......॥

मेरी आशिकी ने मुझे बेइमान बना दिया।
तूने सरे आम मुझे आम बना दिया।।
तूने कहा मै रेशम की डोर, तू मामूली  धागा।
मैंने माना मैैं मामूली धागा तू रेेेशम की डोर।
रेशम की डोर का बंधन कभी ना बंधे।
मामूली धागे का बंधन ऐसा स्वयं टूटे बंधन ना छूटे।।
वजूूद है मेरा मैं कोई खिलौना नहीं।
मेरी हया सरे आम निलाम होती नहीं।।
कमबख्त जमाने का क्या दोस।
तू बोलता रहा मैैं रह गई खामोश।।
तूने कहा मै रेत सा तू पत्थर समान।
मैंने माना मैैं पत्थर ही सही तू रेत समान।
हाँ पत्थर ही सही मैं रूप बदलती नहीं।
वजूद है मेरा एक हवा के झोंके से फिसलती नहीं।।
दिल ने कहा तुम्हें बाहों में भर लूं तू समाता ही नहीं।
बेबशी देख तुम्हें जितना कसके पकड़ती हूँ।
तू फिसलता ही जाता है।
दिमाग़ ने कहा तुमको आजाद कर दू।।
जब सब ठुकरा दें तुम्हें ,
चले आना इस पत्थर के पास।
तू जो मेरी तकदीर हुआ, तो मुुझे जरूर मिलेगा।
फिर देखना ये पत्थर तुम्हें और मजबूत मिलेगा।।
मेरी आशिकी ने मुझे बेइमान बना दिया।
तुने सरेआम मुुझे आम बना दिया।।
                                     Bharti 

Wednesday, August 7, 2019

प्रकृति

बाते करके देखो ये प्रकृति बोलती है

बाते करके देखो ये प्रकृति बोलती है।
इसका एक हवा का झोंका भी भेद दिलों के खोलता है।
अरे ये प्रकृति है, अपना गीत स्वयं गुनगुनाती है।
खुशी हो या गम हर पल मुस्कुराती है।
बड़े-बड़े राज सीने में दबाए रखती है।
अपना सर्वस्व हमेें देकर मौन रह जाती है।
बस प्यार ही तो मांगती है।
प्यार के बदले मानव को मोतियों से तोलती है।
माँ अपने बच्चे की तुलना  उस फुल से ही तो करती है।
खुशी हो या गम बलिदानी फुल ही देता है।
सब वादा करके मझधार में छोड़ जाते हैं।
एक तरु है जो जन्म से मरण तक साथ निभाता है।
ये बावरा मानुस मुसिबत को उस पर्वत सा बताता है।
वो बूढा अपनी पीड़ा कांटो सी बतलाता है।
जब-जब इन्सा की जरूरत बदली।
उसने प्रकृति को समझने का नजरिया ही बदल डाला।
लेन देन कि प्रथा को जन्मा तो मनुष्य ने है।
लाख चाहेें येे मानव पर प्रकृति ने ना माना है।
क्या अभिमान करे खुद  पर ,
एक सुखे पत्ते का भी है ऋण हम पर।
किसी और की क्या जरूरत तुम्हे,  काँँटों से ही सीखते जाना।
अपना फ़र्ज निभाते हैं उनसे बेहतर कोई न जाना।
इसका जर्रा-जर्रा अपनी कहानी बोलता है।
इसका एक हवाा का झोंका भी भेद दिलों के खेलता है।
बातें करके देेेखो ये पर प्रकृति बोलती है।
               
                                        Bharti

Sunday, August 4, 2019

माँ

वो परि सी उम्मीदों से परे है।

वो परि सी उम्मीदों से परे है
उम्मीदे  भी उससेे उम्मीद लगाती है
सुबह के उजाले सा चहकती है
पवित्र पूजा के फूलो सा महकती है
बन्धनों को तोड़ पंछी बन उड़ जाती है
बन्धनों के पवित्र रिश्तों में गोधुुुलि सा घुल जाती है
पर्वतों सी मुसीबतों से अपनों को बचाती है
खुद को वह खादी सा बताती है
उसकी दुनिया में वह बदलों से सटे चाँद सा नजर आती है
बुराई को हटाने के लिए वह नीम सा बन जाती है
परिवार की ओर सेे वह आग के रुप में परिचित है
शक्कर सा घुलकर वह रुठे को मनाती है
अपने गमों की तुलना वह तारों से करके मुस्कुराती है
झगड़ा तो सिर्फ परमेस्वर से करती है
अपने लिए तो केेेवल सदबुद्धि का आशीर्वाद मांगती है
आँखों को नम तो सिर्फ चाँद के सामने ही करती है
डर विश्वास टूटने का है
सहारा उसे प्यार का है
उम्मीद अपनी मन्जिल की है
आशा परिणाम की है
अपनों की खुशियों की खातिर जीति बाजी हार जाती है
उसे शुकून तो माँ केे आंँचल मेंं मिलता है
तभी तो
वो परि सी उम्मीदों से परे है
उम्मीदे भी उससे उम्मीद लगाती है
क्योंकि वो कोई और नहीं माँ है
                                          Bharti

Thursday, August 1, 2019

क्यों? ....क्या केवल हम ही सही हैं।

 क्यों ? क्या केवल हम ही सही हैं।

हम अक्सर दूसरों से यह उम्मीद करते हैं , की वो हमे समझे ।

क्या यह जरूरी है की हर बार वो ही हमे समझे।
हम भी तो उन्हें समझ सकते हैं। समझना तो दूर हम उन्हें सुनतेे तक नहीं। बस अपनी धुन में लगे रहते है।

अगर हम ये सब छोड़ दे....

और यह कहें की सामने वाला गलत नहीं है बस नजरिया थोड़ा अलग है। अगर हम उसको और उसके काम को उसके नजरिए से देखें तो सब आसान लगेेेगा और प्यारा भी लगेगा।जीवन में मधुरता आएगी।यह भी जरूरी है की हम खुद को गलत न कहें।

मुझे किसी ने कहा सुनो सबकि-करो मन की

 हम कोई काम शुरू करने से पहले अगर किसी की राय ले तो यह गलत नही है।सामने वाले को सुनो  उसके बाद उसकी सभी बाते फोलो करने की जरूरत नहीं है केवल उन्ही बातो को फोलो करे जो आपको अच्छी लगी।

जब हमें प्रेम के बदले में विरह की वेदना मिले तब..

हम अपने उस दुःख को लेकर बैट्ठे रहते हैं।हम हमारे आस- पास के माहोल से भागना चाहते हैं। हम समझते हैं मेंने भगवान से उन्हें सबसे ज्यादा मीन्न्ते करके माँगा है। 

चलो  !.....
आज कुुुछ सोचे
अगर हम यह सब एक तरफ रखकर सोचे, हाँ! हमारी  प्रार्थना से ज्यादा शक्ति उसकी भक्ति में है जिन्होंने हमे भगवान से माँगा है। हमें किसी की जरूरत है, यह सही है लेकिन हम किसी की जरूरत हैं। यह सुनकर मन आसमान छुने लगता है।
                                                           
                                                            Bharti