वो परि सी उम्मीदों से परे है।
वो परि सी उम्मीदों से परे है
उम्मीदे भी उससेे उम्मीद लगाती है
सुबह के उजाले सा चहकती है
पवित्र पूजा के फूलो सा महकती है
बन्धनों को तोड़ पंछी बन उड़ जाती है
बन्धनों के पवित्र रिश्तों में गोधुुुलि सा घुल जाती है
पर्वतों सी मुसीबतों से अपनों को बचाती है
खुद को वह खादी सा बताती है
उसकी दुनिया में वह बदलों से सटे चाँद सा नजर आती है
बुराई को हटाने के लिए वह नीम सा बन जाती है
परिवार की ओर सेे वह आग के रुप में परिचित है
शक्कर सा घुलकर वह रुठे को मनाती है
अपने गमों की तुलना वह तारों से करके मुस्कुराती है
झगड़ा तो सिर्फ परमेस्वर से करती है
अपने लिए तो केेेवल सदबुद्धि का आशीर्वाद मांगती है
आँखों को नम तो सिर्फ चाँद के सामने ही करती है
डर विश्वास टूटने का है
सहारा उसे प्यार का है
उम्मीद अपनी मन्जिल की है
आशा परिणाम की है
अपनों की खुशियों की खातिर जीति बाजी हार जाती है
उसे शुकून तो माँ केे आंँचल मेंं मिलता है
तभी तो
वो परि सी उम्मीदों से परे है
उम्मीदे भी उससे उम्मीद लगाती है
क्योंकि वो कोई और नहीं माँ है
Bharti

No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box