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Wednesday, August 7, 2019

प्रकृति

बाते करके देखो ये प्रकृति बोलती है

बाते करके देखो ये प्रकृति बोलती है।
इसका एक हवा का झोंका भी भेद दिलों के खोलता है।
अरे ये प्रकृति है, अपना गीत स्वयं गुनगुनाती है।
खुशी हो या गम हर पल मुस्कुराती है।
बड़े-बड़े राज सीने में दबाए रखती है।
अपना सर्वस्व हमेें देकर मौन रह जाती है।
बस प्यार ही तो मांगती है।
प्यार के बदले मानव को मोतियों से तोलती है।
माँ अपने बच्चे की तुलना  उस फुल से ही तो करती है।
खुशी हो या गम बलिदानी फुल ही देता है।
सब वादा करके मझधार में छोड़ जाते हैं।
एक तरु है जो जन्म से मरण तक साथ निभाता है।
ये बावरा मानुस मुसिबत को उस पर्वत सा बताता है।
वो बूढा अपनी पीड़ा कांटो सी बतलाता है।
जब-जब इन्सा की जरूरत बदली।
उसने प्रकृति को समझने का नजरिया ही बदल डाला।
लेन देन कि प्रथा को जन्मा तो मनुष्य ने है।
लाख चाहेें येे मानव पर प्रकृति ने ना माना है।
क्या अभिमान करे खुद  पर ,
एक सुखे पत्ते का भी है ऋण हम पर।
किसी और की क्या जरूरत तुम्हे,  काँँटों से ही सीखते जाना।
अपना फ़र्ज निभाते हैं उनसे बेहतर कोई न जाना।
इसका जर्रा-जर्रा अपनी कहानी बोलता है।
इसका एक हवाा का झोंका भी भेद दिलों के खेलता है।
बातें करके देेेखो ये पर प्रकृति बोलती है।
               
                                        Bharti

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