लड़ाई
कर बैठी मैं ऐसी नादानी
क्यों मोल ली मैंने ये लडाई
वो सुबह मैं कभी ना भूल पाई
माँ से वो शिक्षा नये रूप में पाई
मेरी नींद तब टूटी
जब सूरज की किरण फूूटी
देर रात सोने की डाट मैंने सुबह - सुबह खाई
मेरी हालत देेख चिड़िया भी ईतराई
उन सब के बीच मेरी गाय का रंभाना
और मेरी नींद का उड़ जाना
माँ का चुुुल्हा - चौका लीपना
उस सौंधी खुशबू का कहीं ओर न मिलना
जब मैंने ली अंंगड़ाई
माँ ने झोली दे बुलाई
गोबर से भरी टोकरी मेरे सिर पर रखवाई
मैं हड़बड़ाई
नाइंसाफ़ी अपनी चरम सीमा तब पार कर पाई
जब सारे काम की लिस्ट मेेरे हाथ में खमाई
मैंने इस अत्याचार के खिलाफ आवाज लगाई
मुझे एक और डयूटी थमाई
दूध-छाछ वालों की कतार देख मैं चकराई
दादी बोली बिटिया रानी अब क्यों घबराई
मैं मन ही मन मुसकुराई
मेरे अपनों ने मिलकर मेरी अच्छी बैंंड बजाई
कुछ भी कहो मजा आ रहा था
झोली भर आशीर्वाद मिल रहा था
समय भी विरोध में था
शरीर दर्द में चूर था
मुझ पर बेेेेहोशी तब झाई
जब मैं जान पाई
माँ के लिए तुच्छ सा है यह काम
दस गुणा ताकतवर हैं बाकी काम
मैं पढ़़ाई की तुलना घर के काम से करती थी
माँ मेरी मन ही मन मुसकुुुराती थी
सबकी अपनी-अपनी महत्ता होती
ये सब कुछ बड़े प्यार से समझाती थी
मैंने अभिमान को तोड़ कसम खाई
मिल बाट कर काम करने की ईच्छा जताई
क्यों मोल ली मैंने ये लड़ाई
अब मैं सब समझ पाई
Bharti

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