Pages

Wednesday, January 12, 2022

बेनाम सा रिश्ता



तुम को पन्नों में उतार पाना कहां मुमकिन है,


कुछ भी तो नहीं था 
मेरे और तुुुम्हारे दरमियान
अनजान सी गलियां , बेनाम सा रिश्ता
कुछ मौन हम रहे तुम भी तो खामोश थे

रेल की पटरी से हम साथ चलते रहे
कैसा रिश्ता था ये हम इसमें भी संंतुष्ट रहे
बेमतलब की बातों से कहीं दूर रहे
हम अपने सपनों की दूनिया सजा रहे

साथ चलते हुए झांंक आया करते थे एक-दूसरे में हम
अब तो जरूरी सा लगने लगे एक-दूसरे को हम
जब लडखडाते कदम कसके बाह पकड़ लेेेतेे एक दूसरे की हम
साथ चलते रहे वक्त जैसा भी आया बाट लेते हम

तू अपने सपनों को तलाशने में व्यस्त रहा
तलाश हमारी भी तो जारी रही
बस वक्त के पन्नों को पलट रहे
पन्ने के हर शब्द में जिक्र एक- दूसरे का करते रहे 

अपने और सपने बस सब कुछ इसी में उलझ कर रह गया
एक बार समय आकर फिर वहीं रुक गया
बेनाम सा रिश्ता अपना वजूद खोज रहा
फिर भी देख इंतजार इन आंखों को तेरा ही रहा।

इतने खूबसूरत शब्द तो हमारे पास भी नहीं हैं।

                Bharti


2 comments:

  1. Replies
    1. Welcome to my sweet world of words 🙏💐Ma'am. Thank you for visiting my blog and reading my post. I am very glad to know that you liked the lines written by me.

      Delete

Please do not enter any spam link in the comment box