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Thursday, August 20, 2020

ऐसी विदाई मंजूर नहीं मुझे




चाहे मुझे मेरी विदाई पर कफन ना देना मंजूर है मुझे।
लेकिन माँ का आंशुओं से भीगा आंचल मिले ये मंजूर नहीं मुझे।

 मेरी आखरी विदाई में किसी का कंधा ना मिले मंजूर है मुझे।
पर उस पिता की लड़खड़ाती लाठी साथ चले ये भी मंजूर नहीं मुझे।

मुझे अग्नि मिले या कब्र ना मिले मंजूर हैं मुझे।
पर वहां मेरे भाई की सिस्कियां तन्हा रहे ये भी मंजूर नहीं है मुझे।

मेरी ना बहे अस्थियाँ गंगा में चाहे कोई ना आके रोए मेरी मजार पर सौ बार मंजूर है मुझे।
पर मेरी वो औलाद जो अभी आंखे खोले और जो ना पाए पास में मुझे ये मंजूर नहीं मुझे।

इससे पहले मैं उम्मीद बनूँ किसी की तू मुझे ही नाउम्मीद बना दे मंजूर है मुझे।
ना सुन पाऊँ किसी कि सिस्कियां तू मुझे अपने आप में समाके बैरागी बनाले सौ-सौ बार मंजूर है मुझे।

Bharti


Tuesday, August 18, 2020

औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई




औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
रिश्तों में लिपटकर अपनी पहचान खोज रही
जब तक तेरी गोद में रही तेरे ताज सा मान हो गई
दहलीज पार क्या की वो उसका इमान हो गई

औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
अपनों में बटि बिना छत का मकान हो गई
जब तक म्यान में रही सबकी शान हो गई
म्यान से बाहर क्या आई सबकी आंन खो गई

औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
जिसके मन की करी उसकी होकर रह गई
सब की खातिर एक को छोड़ा बेवफा हो गई
एक की खातिर सबको क्या छोड़ा वो समाज पर बदनुमा दाग हो गई

औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
चुल्हे की रोशनी में शमशान हो गई
उसके मान पर आए तो महाभारत रच गई
बन के बैरागी इस दुनिया से तर गई

औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई......॥



Saturday, August 8, 2020

जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभव हम और आप - 2


1.
"अ खुदा तू इतना रहम हमपर बरपा
दावतें दसतक हो ना हो कोई गिला नहीं
बस जब भी ये जुबां खुले इसपे तेरा ही नाम हो
और जब भी ये आँखें खुले बस तेरा ही दिदार हो।"

2.
"जानि ये कैसी महफिल सजाई है
यहाँ खाक में लिपटी हुई तन्हाई है
हम प्यार की सौगात लेके आए हैं
यहाँ हर हाथ में खंजर और आँखों में बारूद लिए पाए हैं।"

3.
"की मेरे हर सवाल का जवाब तू है
  फिर तेरे माथे पर ये सिकन क्यों है
  हम तुम्हें देखकर मुसकुराते है
  फिर हमें छूने से तेरे हाथ कांपते क्यों हैं।"

4.
 "जानि कुछ तो लिहाज किया होता
  जब बात पर्दे की थी तो पर्दा किया होता
  हमें किसी और का एक नज़र देखना भी गवारा नहीं
  भरी महफिल में यूं अपना तमाशा ना बनाया होता।"

5.



 " मेरा कोई दोष ना था
  तुम्हें ही होश ना था
  हम तो रोज तेरे दरवाजे पर आया करते थे
  उसे बंद देख वापस लौट जाया करते थे।"

6.
 " की वो किसी की याद में इस कदर खोए हैं
   कोई बताए उन्हें की सुबह हो गई है
   हम तो उन्हें समझा-समझा कर थक गए है
   वो रोशनी चांद की है तेरी शमा तो कब का बुझ गई है।"

7.
  " जानि इतना तो होश बचाकर रखो
    वो सामने आ जाए उसे पहचान सको
    ये तेरी उंगलियां हैं जो अपना कर्ज़ अदा कर रही हैं
    वरना तेरी स्याही तो कब का खत्म हो गई है।"

8.



   ये खुदा की ख़ुदाई है जो हम पर ये रहमत बरसाइ है
   तुम याद थे बस याद थे
   माफ करना वैद जी ने हमारी यादाश्त कमजोर बताइ है
   हम तुम्हें भूल गए बस अब हमें याद नहीं।
 

                        Bharti

Thursday, August 6, 2020

अपना - अपना नजरिया




विश्वासघात कितना आसान है ना यू ही कह देना।
पर उतना ही मुस्किल है किसी का विश्वास पा लेना।

कितना आसान है ना ख्वाब की दुनिया में जीना।
पर उतना ही मुस्किल है असल जिंदगी में उन्हें पूरा करना।

कितना आसान है ना किसी के रंग में रंगना।
पर उतना ही मुस्किल है उसको अपने रंग में रंगना।

कितना आसान है ना रिशतों को तोड़ कर चले जाना।
पर उतना ही मुस्किल है उन्हें उम्र भर ना भूल पाना।

कितना आसान है ना एक पौधे का रोपण करना।
पर उतना ही मुस्किल है उस पौधे को सींच कर पेड़ बनाना।

कितना आसान है ना किसी के अस्तित्व पर सवाल करना।
पर उतना ही मुस्किल है उसके अस्तित्व के लिए सारी दुनिया से लड़ जाना।

कितना आसान है ना किसी की जिंदगी में झांक आना।
पर उतना ही मुस्किल है उसकी रूह में उत्तर कर उसके अंदर झांक पाना।

कितना आसान है ना किनारे पर बैठ कर लहरों को देखना।
पर उतना ही मुस्किल है उनमे उठे जज्बातों के तुफान को देख पाना।

कितना आसान है ना एक माला से मनको को अलग कर देना।
पर उतना ही मुस्किल है चुन-चुन के हर मनके को एक माला में पिरोना।

कितना आसान है ना किसी पर अपना अधिकार जमाना।
पर उतना ही मुस्किल है स्वयं को उसके अधीन करके जिंदगी को जी पाना।

                        Bharti