औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
रिश्तों में लिपटकर अपनी पहचान खोज रही
जब तक तेरी गोद में रही तेरे ताज सा मान हो गई
दहलीज पार क्या की वो उसका इमान हो गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
अपनों में बटि बिना छत का मकान हो गई
जब तक म्यान में रही सबकी शान हो गई
म्यान से बाहर क्या आई सबकी आंन खो गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
जिसके मन की करी उसकी होकर रह गई
सब की खातिर एक को छोड़ा बेवफा हो गई
एक की खातिर सबको क्या छोड़ा वो समाज पर बदनुमा दाग हो गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
चुल्हे की रोशनी में शमशान हो गई
उसके मान पर आए तो महाभारत रच गई
बन के बैरागी इस दुनिया से तर गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई
औरत ना हुई दो धारी तलवार हो गई......॥
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