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Monday, July 20, 2020

चलो इस बार स्वंय के लिए जीते हैं



जब विश्वास तोड़ दिया जाता है,
एक आंशु तक ना गिरता आत्मा रो देती है
बस एक ख्याल बाकी रह जाता है 
बाकी सब बिखर जाता है 
सांस थमती नहीं,रूह जम जाती है
बनकर पूतला जिम्मेदारी ढोते रहते हैं
एक बार वो मिले तो सवाल करूँ उसे 
क्यों किया उसने स्थिर पानी में तूफान उठा दिया उसने
खैर वो खुश तो है ना जिंदगी के उस मौड़ पे
हम तो परछाई थे
फिर क्यों चल दिए हमें छोड़के
माना आदि हैं हम उनके कांधे पर सर रख सोने के
पर आदत कहां है उन्हें भी यूं अकेले चलने की 
ये तो समय का चक्र है जो अपना काम करता है
फिर आसपास क्यों मंडराया करता है 
पल में भूल जाएँ सब कुछ ऐसा नहीं होता है
इनसान हैं भगवान ने स्वंय बनाया है 
खुद को मिटा ले इतना कायर थोड़े हैं
पल पल कोशें हम उसे ऐसा जरूरी थोड़े है
कोई तो होगा जो इसे फिर से जोड़ देगा ऐसा आभास होता है
चलो इस बार स्वंय के लिए जीते हैं।
  
      Bharti

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