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Wednesday, January 12, 2022

मुंह मत खुलवा मेरा तेरी औकात लिख दूंगी।

जज्बात


मुंह मत खुलवा मेरा तेरी औकात लिख दूंगी।
आज  मैंने कलम उठाइ है तेेेरा इतिहास लिख दूंगी।।

तू  वो राम नहीं जिनके वचन की खातिर  मैैं वन-वन भटकूँगी।
तू वो रावण नहीं जिनके मरण की खातिर मैं पल-पल तरसूूँगी।
मैं वो अंबा हूँ स्वाभिमान की खातिर तेरी शैय्या सजा दूंगी।
कब  तक यूं सहूंगी अब मौन तोड़ा है तेरा अभिमान तोडूूंगी।

की  जब तू जानता है तूझे पैदा मैंने किया है।
तू  मुझसे शुरू मुझपे खत्म हूआ है।
तो फिर मुुझे क्यों तार-तार करने पर तूला है।
ठहर जा बस कर आखिर कब तक आग की शैैैय्या में जलूँगी।

गलती मेरी है मै देर से आती थी सौ सवाल करती थी।
तू देर से आता था किस हाल में आता था इग्नोर करती थी।
काश मैंने तुम्हें इनसानियत सिखाई होती तो आज ये न हुआ होता।
एक कलि यूं ना टूटकर सूनसान सड़क पर मिली होती।

Baby i like you. I want you. I need you.trust me वो क्या अलफाज थे तेेरे।
कैसे बह जाती जज्बातों के भवर में साथ मैैं तेरे।
बहुत से रिस्ते ना सही एक पगड़ी, एक आंंचल,एक कलाइ साथ रहे मेरे।
चाहने वाले तो तेरे भी बहुत थे मैैंने कब कहा मै उन्हें ठुुकरा दूंगी।

कल्पना तो करके देेेखो अपनो से दूूर जाना क्या होता है।
अनजान गलियों के मुह मौड़े खड़े रिस्तों को अपनाना क्या होता है।
बीज से बने पौधे का उखड़ कर कहीं ओर जम जाना क्या होता है।
अपने अरमानों की शैय्या सजाकर उस आंगन में दफन होना क्या होता है।

ये इन्साफ नहीं जमाने के तराजू का बराबर माप नहीं।
वो तो ऐसा है तू भी ऐसी ही होगी क्या।
ये पहनोगी तो यही होगा ।
तुम वो नहीं जो तुुुम्हें वो सब सुविधाएं मिलेंगी।
कब  तक बहेगी नदी की धारा यूंही।

अब परछाई भी चिढ़ाने लगी मुझे क्या कर देेेगी आजाद मुझे।
जब  नोच-नोच कर तार-तार कर दिया मुझे।
सवालों की बौछार , चुप्पी की बेडीयों  का उपहार मिला ।
अब  ये बेडीयांं तोडूगी ,कब तक कुुछ ना बोलूँगी।।


मुंंह मत खुलवा मेेरा तेरी औकात लिख दूंगी।
आज मैंने कलम उठाइ है तेरा इतिहास लिख दूंगी।।

                   

                                Bharti

4 comments:

  1. Thank you very much for coming into my blog and reading my post

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  2. सर आपका मेरे ब्लॉग में स्वागत है। मेरे ब्लॉग में आकर मेरी पोस्ट पढ़ने और टिप्पणी करने के आपका धन्यवाद।

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