मुझे मेरे हृदय के धड़कने की आवाज अपने कानों में साफ़ सुनाई दे रही थी।
कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरे पास से गुजर रहा हर सक्स की आंखों में मुझे बहोत से सवाल नजर आ रहे थे। और स्वयं मेरे पास भी बहुत सारे सवाल थे । एक पल को लगा किसी को रोक लूं.. पूछूं वहां के माहौल और लोगों के बारे में। मन कर रहा था उठो और भागो यहां से, लेकिन आत्मा चीख-चीख कर कह रही थी नहीं यह सही नहीं है। मेरे हृदय और आत्मा दोनों में जोर - दार बहस चल रही थी कि इतने में एक आवाज आई....'
"मैडम जी आपको अंदर बुलाया है"
मैंने एक गहरी सांस ली और कहां --
हे! प्रभु संभाल लेना।
अपने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान जो मेरे अंदर के डर को छुपा सके। और ढ़ेर सारा आत्मविश्वास क्योंकि मैं कुछ ग़लत नहीं करने जा रही थी।
मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा सामने कुर्सी पर एक सज्जन बैठे थे, उनके चेहरे पर हल्की सी चिढ़ाने वाली मुस्कान थी। कुछ पल के लिए उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली और कहां आपको देखकर मुझे मेरे पूराने दिन याद आ गए।
मैंने सिर को झुकाकर हाथ जोड़कर उनको प्रणाम किया। मुझे सामने रखी कुर्सी पर बैठने के लिए कहा गया। आभार व्यक्त करते हुए मैंने कुर्सी को खींचा और मैं उसके ऊपर बैठ गई।
सच कहूं तो ये सब मैं पहले दिन यूट्यूब में वीडियो देखी थी। किसी अधिकारी से किस तहज़ीब में बात करते हैं।
हम दोनों में सवाल और जवाब का सिलसिला शुरू हुआ। उनके सवाल मुझे एक तीर के समान लग रहे थे। मानो वे मुझे घायल कर ही देंगे। मैं भी कहां हार मानने वाली थी। मैंने भी एक सच्चे सिपाही की तरह डटकर मुकाबला किया। हर बार मेरा जवाब मेरी डाल बनता और मुझे घायल होने से बचाता।
आखिर मुझे वह शब्द सुनने को मिल ही गए जिसको सुनने के लिए मेरे कान तरस रहे थे। क्योंकि मैंने अब तक उनकी दो शर्तों को पूरा कर लिया था। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में मैं पास थी।
अब एक अन्य अधिकारी के साथ मुझे मेरा काम दिखाने के लिए भेजा गया। अब मैं यह कहूं कि मुझे सब कुछ अच्छा लग रहा था। नहीं। मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। ना ही कुछ समझ आ रहा था कि अगले ही पल मेरे साथ क्या होने वाला है। मैंने जितनी कल्पना की थी सब कुछ उससे अलग था। उस समय का हर पल मुझे कुछ ना कुछ सिखा रहा था। पास से गुजर रहे शख्स मुझे उम्मीद की नजर से देख रहे थे।
"मैडम आप अंदर जाइए"
मानो उस अधिकारी का और मेरा सफर यही तक का था। मैंने कमरे में अपना कदम रखा ही था, कि एक गहरी भीड़ जैसी आवाज ने मेरा स्वागत किया।
सबके चेहरे पर स्माइल थी।
"Go..od mo..rrrrrning te..acher jiiiii...".
2 सेकंड के शब्दों को उन्होंने इतना लम्बा और सुरीली आवाज में कहा कि इतने में मैं अपने आप को संभाल सकती।
उन सब के चेहरों को देखकर मैं अपनी सारे घबराहट को भूल गई । ऐसा लगा मानों मैं- मैं नहीं हूं मुझ में एक नई ऊर्जा सी दौड़ गई । अब सब कुछ अच्छा लगने लगा ।मन कर रहा था जितना भी समय है उसे जी भरकर इन सब के साथ जी लूं। क्या पता कल यह पल आए या ना आए क्योंकि यह मेरा सपना था जो आज पूरा होता नजर आ रहा था।
मुझे "बागी" फिल्म का एक डायलॉग याद आया
" जंगल में हिरण जब जागता हैै। तो सोचता है कि आज अगर मैं जी जान से नहीं भागा तो मैं मर जाऊंगा उसी सुबह एक शेर जागता है और सोचता हैै आज अगर मैं जी जान से नहीं भागा तो मैं भूखा मर जाऊंगा शेर हो या हीरन हो भागना तो पड़ेगा ही । एक बागी और एक सिपाही में ज्यादा फर्क नहीं होता, पर यह उनके मकसद है जो एक को बागी और दूसरे को सिपाही बनाते हैं । बागी बनो पर किसी मकसद के लिए।"
उसमें टाइगर ने वही रहकर मेहनत करने का सोचा था। मैंने भी वही रहकर मेहनत करने का सोचा।
मैंने पढ़ाना शुरू ही किया था कि, एक अन्य अध्यापक ने कक्षा में प्रवेश किया। वो अंतिम बैंच पर जाकर बैठ गया। उन्होंने कहा मैं प्रेक्षक हूं। आप पढ़ाना शुरू करें। अचानक से सारा वातावरण परिवर्तित हो गया। विद्यार्थियों ने अपने हाव-भाव बदल लिए। यह लो हम बैठ गए हैं अब आप हमें पढ़ा कर दिखाओ। हम भी तो देखें आप क्या पढ़ा सकते हैं। मुझे ऐसा लगने लगा। मेरे सामने "गब्बर और उनके गुंडे" बैठे हुए हैं, और मैं "बसंती" हूं। मुझे उन सबके सामने बिना रुके पढ़ाना है, मेरी जुबान रुकि तो मेरी नौकरी गई। मेरा मन कहे रहा था नहीं यह सही नहीं है, लगा ये मेरी बेज्जती कर रहे हैं। सच में उस समय कक्षा में ना तो कोई नम्र भाव वाला विद्यार्थी नजर आ रहे थे और न ही स्नेह भाव वाला अध्यापक। वहां केवल नौकरी देने वाले और नौकरी लेने वाली नजर आ रहे थे। सच कहूं तो भावना महज़ एक शब्द था।
सब एक- दूसरे को परखने में लगे थे।
मानो 'बादशाह अकबर' के दरबार में 'अनारकली' नृत्य पेश कर रही हो।
लेकिन कुछ भी हो मैंने भी देखना था। क्या इससे भी अधिक कठिन हो सकता है। जैसे - जैसे समय बीत रहा था बच्चों के चेहरे खिलने लगे थे। उन्हें समझ आ रहा था जो मैं समझाने की कोशिश कर रही थी। बीच-बीच में बच्चों के सवाल आने शुरू हुए। मैंने भी उनको बड़ी सरलता से जवाब दिया। समय अभी पूरा नहीं हुआ था कि मेरा चैप्टर पूरा हो गया। मैंने बच्चों से कहा आज के लिए केवल इतना ही आगे का हम कल देखेंगे, हां अगर आप सभी को कोई डाउट है तो आप मुझसे पूछ सकते हैं। एक विद्यार्थी ने कुछ पूछने पर मैंने उसे उसका जवाब दिया। बच्चे बहुत खुश थे।उन सब ने खिलखिलाती आवाज में मुझे धन्यवाद कहा।
मैं सातवें आसमान पर पहुंच गई थी। वो कहते है ना मेरे ओर से तो 'पैसा वसूल परफोर्मेंस थी'
प्रेक्षक का चेहरा वैसे का वैसा ही था। मुझे वापस ऑफिस में जाने को कहा गया। मुझे जाते हुए अब ये नौकरी खोजाने का भय नहीं था। बल्कि मुझे एक-एक करके मेरे सारे अध्यापक याद आ रहे थे। मेरी आत्मा से उनके लिए दुआएं निकल रही थी।
जैसे एक माली अपने पौधों को सींचता है। ठीक उसी प्रकार एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को अपने ज्ञान से सींचता है।
वो अक्सर कहते थे जब तुम हमारे स्थान पर आओगे तब पता चलेगा। वो सचच कहते थे। एक अध्यापक की निजी जिंदगी चाहें जैसी भी हो लेकिन वह अपने विद्यार्थियों को एक समान और बेहतर शिक्षा देने की कोशिश करता है।
मैंने ऑफिस में दोबारा क़दम रखा, "कैसा लगा ये विद्यालय और यहां के विद्यार्थि,
क्या आप यहां पढ़ाना पसंद करेंगी"।
मारे खुशी के मेरे मुंह से निकला की मेरा विद्यालय और मेरे बच्चे बहुत अच्छे हैं।
सच में, हे! गुरु धन्य हो।🙏💐