लोगों से मेरे बारे में ना पूछो।
कोई मेरे बारे में उतना ही जानता है।
जितना मैंने उसे जानने दिया है।
मेरे बारे में सब कुछ जान लें।
हाए! उतनी तो मैंने खुद को भी पर्मिशन नहीं दी।
हां अगर मेरे बारे में कुछ जानना है।
तो आपको मुझे ही जानना होगा ।
लोगों की मेरे प्रति राय नहीं।
हां सब कुछ तो नहीं।
लेकिन आपके प्रश्नों का जवाब मैं जरूर दूंगी।
मैं कोई खुली किताब तो नहीं हूं।
लेकिन कोई मुझे समझ ना पाए मैं वो अल्फाज़ भी नहीं हूं।
मुझे बातें करना अच्छा लगता है।
सभी से नहीं कुछ गिनती के लोग हैं।
खुशियों को बांटना है ये मैं मानती हूं।
गमों को कैसे समेटना है मैं जानती हूं।
कुछ अलग ही ख्वाहिश है मेरी।
लोगों खुलकर हंसना चाहते हैं।
लेकिन मैं जी भर कर रोना चाहती हूं।
कितनी अजीब बात है ना।
मुझे लगता है हम बड़े हो गए हैं।
शायद इतना कि पिता हमारे कांधे पर सर रख रो दे।
और मां को अपनी बाहों का सहारा देकर हाथों से खिलाएं।
भाई के सिर पर हाथ रखके कह दे मैं संभाल लूंगी तू डर मत।
अपनों की ख्वाहिशों मैं उतना वजन नहीं होता।
जितना स्वयं के ख्वाब में होता है।
कितना आसान होता है ना सफर में अकेले चलना।
वहीं अगर कोई साथ चलने वाला हो तो कभी पलटकर देखो , तो कभी उसके पिछे तेजी से दौड़ना।
सच में बहुत कुछ उलझा रहता है इस खुरापाती दीमक में।
कब क्या सोच कर किस दिशा में दौड़ना शुरू कर देता है नहीं जानते।
"हां बस इतना जानती हूंं।
लोगों से मेरे बारे में ना पूछो।
कोई मेरे बारे में उतना ही जानता है।
जितना मैंने उसे जानने दिया है।"
No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box