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Friday, April 9, 2021

समझ या समझौता




कई दिन से वो कलाई घर नहीं आई
मेरे घर की लक्ष्मी बिना तकिया के सोई
दीवारें पूछ लेती हैं चेहरे की ये रौनक तूने कहां गवांई
मन को मार खुद को समेटे बैठी हूं किस-किस को दूं गवाही।

2
वो दाग मिटाने में लगा है जो बाहर देश से आया है
जब साफ उनको करता है तो दाग हाथ लग आता है
दीवार सफेद हैं मेरे मकान की वो दाग कहीं ना लग जाएं
इसिलिये मेरे घर की लक्ष्मी बिना तकिये के सोती है।

पड़ोसी पूछ लेतें हैं तेरा घर बड़ा चुप्प-चुप्प सा रहता है
जो बर्तन शोर करते थे वो आजकल मौन रहते हैं
दिन भर महफ़िल सजती थी बड़ा सन्नाटा रहता है
वो भी बड़े शान से कहते हैं हम तेरे पड़ोस में रहते हैं

4
कभी घर आए तो आंगन पार ना कर पाए ऐसा क्यों होता है
तू अपने ही घर में दुत्कारा सा क्यों रहता है
ये कैसा दाग लगा है जग में जो अबतक ना धुल पाया है
क्या सर्दी क्या गर्मी ये तो बारिश से भी ना धुल पाया है

5
सदियों  की परंपरा को वो चुपचाप से ढोते आइ हैं
पहले वो पर्दे में थी आज सारा जहां पर्दे में नज़र आया है
सदियों से जो कहते थे हम दर्द अछूत का सहते आए हैं
इसने सबको अछूता बना दिया अब भेद समझ पाए हैं

6
जब ये लॉकडाउन था दिल बड़ा बेचैन रहता था
कोई भर पेट सोता था तो दिन रात रोता था
पैसे की होड़ में ये सारा जहां मदमस्त रहता था
पल में लाशों की बारिश देख कहां अब होश रहता है।

                      Bharti



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