की जिस साख पर बैठी हूँ, वो साख पूछती है।
तुम पा तो लोगी ना, मंजिल जो तय की है
मैंने अपनी पूँजी को, तुम पे ही लुटाया है
सब पहचान सकें तुमकों, वो पहचान बनानी है।
जब भी उठो ऊपर तुम, मेरे मस्तक पे पैर रखना।
वो मुकाम अब दूर नहीं, मन में ये स्थिर रखना।
गिरने जो लगो अगर तुम, मेरा हाथ थामें रखना।
बेमेल सवालों का, हल साथ में रखना।
जिस साख पर बैठी हूँ, वो साख बड़ी प्यारी है।
वो जो मुझको कहती, वो सौ बात पे भारी है।
यूं तो हर पेड़ ने इस बगिया में ,अपनी पहचान बनाली है।
मुझे गोद ही वो भाति है,उसकी हर अदा निराली है।
जिस साख पर मैं बैठी हूँ, वो एक दिन टूट जानी है।
मुमकिन नहीं लगता है भूलना, तेरी याद तो आनी है।
मैंने हर अलफ़ाज़ को तेरे, गीता ही माना है।
उसनें पूरी कर ड़ाली, जो की मैंने मनमानी है।
जिस साख पर बैठी हूँ, मैं उसकी परछाई हूँ।
अगर बन ना सको तुम ताकत,तो बनना क्यों कमजोरी है।
अगर आ ना सको किसी काम, तो ये वर्थ जवानी है।
तेरे सपने सच करने की, अब हमनें ठानी है।
Bharti
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