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Friday, May 15, 2020

ना जाने क्यों हमसाये सा नजर आया


मैैंने कहा ला देेेख लूूँ दिखा ज़रा जख्म तेेरेे
हसकर उसने जवाब दिया हैं हाथ नमकीन तेरेे।
उसकी नज़र कहर सा ढा गई
सदीयों से दबी पीर उसकी सिसकियाँ बोल गई
मैैं तो हलके से उसके मन को टटोलने चलि गई

वो तो दिल की गहराई में उतरते चला गया
दसकों सेे दबे राज दिल के खोलता चला गया
परछाई बनकर उसका पीछा करना चाहा
वो कमबख्त परछाई को  ही तोड़ता चला गया

ना जाने क्यों हमसाये सा नज़र आया
वो तो अपनो से मिले जख्म से जख्मी पाया
सहमा  सा पथ निहारता पथियार की पाया
उस मोड़ पर भी वो विशवास से चूर पाया

मै उसमें मेरे कान्हा की छवि को देेेेखती
ना मुझमें मीरा सी भक्ति, ना राधा सी शक्ति
मैं कलयुग की नारी बस  तुझसे सच्ची भक्ति
बनकर रुकमणी ले जाऊँ पीर के भवर से कहीं दूर तुझको

जब छूकर देखा घाव उसके नासूर सा नज़र आए
बस विशवास पर विशवास था दवा ना साथ लाए
हाँ कुछ-कुछ परिचित थी मैं वो निशां जाने पहचाने नजर आए
याद आया ये तो गिरकर संभलने से पाए

वो आंखों में विशवास लिए हाथ बढ़ाते चला गया
लड़खड़ाये कदम उसके पर आगे बढ़ता चला गया
उसका मेेरी ओर बढ़ता हर कदम मुझे आजमाता चला गया
संघर्षों का आदि वो बतलाता चला गया

उसने कसकर पकड़ा हाथ मेरा कभी ना छोड़ने के लिए
मैंने आत्मसमर्पण किया अब  जीना है तेेरे लिए
बस मुझको मुझसे शर्मसार ना करना ये अरदास लिये
तू पहरेदार बन मेरी  आबरू  का ये विशवास लिए

विशवास की लौ लिए हर बाधा पार कर जाएंगें
उस कर्ता ने चाहा तो कर्म रंग लाएगा सफलता झूम जाएगी
तेरे रंंग में रंगकर नमक और मिठास का भेद भूल जाएगें
अब मंजिल दूर नहीं हर धर्म को अपनाएंगे

                                                    Bharti


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