बस ऐसा सुना था।
आखिर वो दिन आ गया,
सूने सुनाए अहसास को क्यों न जीया जाए।
चलो क्यों न शादी की जाए।
अब तो बस हां जी, जी हां, क्यों नहीं जी, जी जरूर जैसे अल्फाज़।
सुनकर अच्छा लगता था।
अब बस दिमाग में ये बात बैठाई गई।
अपने परिवार को विदा करने कि तैयारी की गई।
यह थी जिंदगी में बदलाव कि शुरुआत।
अब तक सब ठीक था।
पापा बोलते थे जो बनना है वो बन,
मम्मी बोलती थी मेरी बेटी अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेगी।
भाई बोलता था तू कर मैं हूं ना।
अब............
पंडित जी...... शादी संपन्न हुई।
मम्मी नम आंखें, लड़खड़ाती जुबान , कांपते हाथों में, खाने की थाली....
मरी बेटी को खाना खिलाना है।
ननद ..... हमारी भाभी हमारे साथ बैठकर खाएगी।
उस समय लगा हां सब कुछ बदल जाता है।
मैं बस .... एक पांच साल की बच्ची की तरह,
मुझे.. मेरी.. मम्मी के पास जाना है।
मुझे मेरी मम्मी के पास जाना है।
मुझे मेरी मम्मी के पास जाना है।
मम्मी ने मुझे खाना खिलाया, ऐसा लगा मानो ये आखरी बार है।
मुझे विदा किया गया।
यह वह पल था जिसे मैं कभी याद नहीं करती।
उस समय मेरे पति ने मुझे कहा।
तुम्हारा जब मन करे, तुम अपने परिवार के पास रहने के लिए आ जाना।
इसमें तुम्हें किसी से पूछने की जरूरत नहीं है।
यह सब सच है।
मैं जब से ससुराल आई हूं तब से सब कुछ बदल ही रहा है।