पता नहीं क्यों तेरी बातें मेरे ज़हन से जाती नहीं
रात बीत जाती है पलकों तले नींद आती नहीं
पता नहीं क्यों तेरा जिक्र जुबां से हटता नहीं
और तेरे जिक्र कि हया से पलकें उठती नहीं
पता नहीं क्यों धड़कन की आवाज कानों में सुनाई देती है
एक पल को तेरी खबर ना मिले तो आत्मा रो देती है
पता नहीं क्यों अब तुम्हें दुआ में मांगा करती हूं
कहीं टूट ना जाए भ्रम मेरा बस इसी बात से डरती हूं
पता नहीं क्यों तेरी गैरमौजूदगी में तुमसे बहुत सी बातें होती है
और तुम रूबरू क्या आए खामोश ये रातें होती है
पता नहीं क्यों मुझे सपना अब तेरा ही अच्छा लगता है
मेरा सपना ही तुम हो तो मुझे वो सपना सच्चा लगता है
पता नहीं क्यों खुद को भूल जाने को दिल करता है
पूछे कोई मेरे घर का पता तो तेरी दहलीज बताया करता है।

वाह।
ReplyDeleteधन्यवाद सर।
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