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Monday, July 29, 2019

डर




अजीब सी बैचेनी सताए जा रही है ।
क्योंकी ? मुझे डर लग रहा है ।।

किसी को यह गन्ने सा मीठा लगे तो किसी को करेले सा कडवा लगे लेकिन मुझे यह लूूँण सा लग रहा है।
किसी को यह पाने की खुशी लागे तो किसी को विरह की वेदना सा लागे लेकिन मुझे राधा का इंन्तजार सा लग रहा है।
किसी को तेैरना सीखा दिया तो किसी को डूबा दिया पर मुझे मझधार में खड़ा कर रहा है।

मोतियों से भरा भंडार बीखर रहा है।
सब कुुछ समेटू कैसे आंँचल छोटा लग रहा है।।

मेरे अतित की खुशिया मेरे मन को लहजा रही है।
मेरा आज मोन रहकर अपने गमो को समेट रहा है।
मेरा भविष्य मन मे आशाएं लिए मेरा पथ निहार रहा है।

कोई मधुर सी ध्वनी सुुुुनाई पड़ रही है।
मेरे डर में मुुुुझे मेरी ताकत नजर आ रही है।।

उम्मीद की ज्योति में डर का तेल डालकर विस्वास की लो जला रही हूँ।
तेजी में विरोद्ध को पाया, धीरे में आलस्य को, मध्यम में संतोस का जन्म हो रहा है।
अतीत को साथ लेेेकर भविष्य की चिन्ता करके आज में डूबी जा रही हूँ।
क्योंकि मै डर रही हूँ ।
अजीब सी बैचेनी सताए जा रही है।।
                         
                                                                   Bharti


Friday, July 26, 2019

जोक्स😂


👦रिश्ते वाले: "जी लडकी ने क्या किया हुआ है

👩घर वाले: "जी इसने नाक में दम कर रखा है , इसे ले जाएँ बस......"😜😂😂😂😂







👌काम करो तो ऐसा करो कि लोग कहें.....😦🙏😈

👍तू रहने दे भाई हम आपए कर लया गें .....!😡😄😂😂😂









बदलाव



  • दुनिया को बदलते-बदलते मै कितना बदल गई
  • पहचानने से मुझको आईना मुरक गया  
  • अरे क्या थी वो मजबूरी जो मुझे मजबूर कर गई
  • हमारी मजबूरी पर ये दुनिया मस्ती कर गई
  • मेरी इस दुनिया से होड़ लग गई
  • मुझे धकाकर ये दुनिया आगे निकल गई 
  • हम संसार के इन नजारो में इस कद्र डूब गए
  • डुबोने से मुझको दरिया मुकर गया
  • संसार का स्वाद चखते-चखते हम अपना स्वाद भूल गए
  • जमाने की चाल में चाल मिलाते-मिलाते हम अपनी चाल भूूल गए
  •  जिन्दगी में अनेको आए और चले गए
  •  किसी को हमने समेट लिया तो कोई हमे समेटते चले गए
  • फर्माइशे पूरी की सबकी मैने
  • सबने मुझे ही खिलौना बना दिया 
  • कहते है नासमझ हूँ मैं
  • फिर भी स्लाह देने के काबिल बना दिया
  • दुनिया को बदलते-बदलते में इतना बदल गई
  • दूसरो से मिले सहारे को छीना, 
  • अपने पैरो पर खड़ा होना सीखा दिया

 Bharti




Tuesday, July 23, 2019

फिर से उन्ही राहो में लौटने को जी चाहता है

फिर से उन्ही राहो में लौटने को जी चाहता है,
आओ लौट चले उन्ही राहो पर हम और तुम।


  • क्यों आया  वह चौरहा जिससे बिछुुड़ गई सब राहें
  • कहाँ है हम और कहाँ वो दिन पिछड़ गई सब चाहेें
  • जिन्हें हम हृदय से अपना मान रहे
  • वो ना जाने किसे अपना मान चुके
  • इस भीड़ में हम सबसे अंजान रहेे
  • ना जाने क्यों ? सब हमे पहचान रहे
  • हाँ ! वो सब भी इस दर्द से ना अंजान रहे
  • इस वक्त की दोड मेंं हम अपने आप मेंं खोए रहे 
  • मै सही थी।या वो इसी कस्क्श्म्क में खोए रही
  • मै दूखी थी तो क्यों थी इस बात ने मौन तोडा
  • होठो में मुस्कान आई मैंने मायूसी का दामन छोड़ा 
  • स्वयं में झांक उठ खड़ी हुई बेहोशी को तोडा
  • हाँ एक आह सी निकली अंगड़ाई ने मुझे मरोड़ा
  • स्वयं को शहंशाह कह मन दौड़ा
  • जान बाकि है, साँस है, तो आश को क्यों छोड़ा 
  • भूत से सीख कर भविष्य का सोच कर वर्तमान में खीलना चाहती हूँ
  • एक बार फिर जीना चाहती हूँ
  • फिर से उन्ही राहो में लौट जाना चाहती हूँ
  • वहीं बैठी मिलेगी दरवाजे पर माँ आंँचल बिछाए हुए
  • मिलेगा पिता भी उसी चौरहे पर छाता लिये हुए 
  • हाँ वहीं उसी कौने में भाई बेठा बेठा है शिक्वे लिए हुए
  • डुबो देंंगे आनन्द के समुंद्र में मुझे 
  • जानती हूँ सभी बस अब मुुझे सुनते रहेंगे
  • खुशी की चीख निकले जा रही है
  • मेरी रातो का स्वेरा जिना चाहता है 
  • हाँ फिर से उन्ही रहो में लौटने को जी चाहता है
Bharti